उत्तराखण्ड क्रांति दल
परिचय
उत्तराखण्ड क्रान्ति दल (Uttarakhand Kranti Dal) एक ऐसा क्षेत्रीय राजनैतिक दल है जो उत्तराखण्ड राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह दल राष्ट्रीय दलों के प्रति उत्तराखण्ड की विशेषता और स्वाभिमान को सार्थक बनाता है, जबकि वह अपने उद्देश्यों में क्षेत्रीयता और पहाड़ी विकास के मुद्दे को महत्वपूर्ण मानता है।
उत्तराखण्ड क्रान्ति दल (Uttarakhand Kranti Dal) का गठन मुख्य रूप से उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता और विकास के लिए हुआ है। इस दल की स्थापना में प्रमुख उद्देश्य जैसे क्षेत्रीय विकास, स्थानीय संस्कृति और भाषा के प्रति सम्मान, जो उत्तराखण्ड की विशेषता को बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहते हैं।
उत्तराखंड क्रांति दल का गठन
उत्तर प्रदेश के गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों की गहरी उपेक्षा के विरुद्ध उत्तराखंड की राजनीतिक दावेदारी का एक महत्वपूर्ण पल था उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) का गठन 25 जुलाई 1979 को मसूरी के "अनुपम होटल" में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में गठित हुआ, जिसमें गढ़वाल और कुमाऊं के लोगों के द्वारा उनके संगठनात्मक एवं राजनीतिक अधिकारों की मांग की गई।
इस सम्मेलन में, जिसमें कुमाऊँ विश्वविद्यालय के उप कुलपति डॉ. डी. डी. पंत भी शामिल थे, एकमत से उन्हें दल के केंद्रीय अध्यक्ष के रूप में चुना गया। इस समय उपस्थित अन्य प्रमुख नेताओं में दिवाकर भट्ट, कृपालसिंह रावत "सरोज", द्वारिका प्रसाद उनियाल, हुकमसिंह पंवार, मदनमोहन नौटियाल, नित्यानंद भट्ट, ए. आर. के. पंत, विनोद बड़थ्वाल, विनोद चंदोला, दौलतराम पोखरियाल, खड़गसिंह बगडवाल और वकील ललित किशोर पांडे शामिल थे, इन सभी ने मिलकर उत्तराखंड के लोगों के एकजुट होने की आवश्यकता को साझा करते हुए इस दल के गठन का निर्णय किया।
इस सम्मेलन के द्वारा जब तक उत्तराखंड के लोग एक साझा राजनीतिक मंच के रूप में नहीं उभर जाते, तब तक उत्तराखंड को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता इस विचार का समर्थन किया गया।
उत्तराखंड क्रांति दल जल्द ही राज्य की दावेदारी की गति में आया, जो पहाड़ी समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए जुझ रहा था। इसका गठन न केवल एक राजनीतिक जागरूकता का प्रतीक था, बल्कि यह उत्तराखंड के निवासियों के बीच पूर्ण जागरूकता और उत्तराखंड के अपने आत्मविश्वास के नए अंदाज का प्रतीक भी बन गया।
जब उत्तराखंड राज्य के रूप में 9 नवंबर 2000 को गठन हुआ, तो उत्तराखंड क्रांति दल का संघर्ष एक ऐतिहासिक जीत की पुनरावृत्ति बन गया।
आज, उत्तराखंड क्रांति दल की धरोहर एक ऐसे संघर्ष को प्रमाणित करती है जो समस्याओं के सामने आकर जनसमुदायों की अवश्यकताओं के लिए समर्पित व्यक्तियों की एकता और संघर्ष की शक्ति को सामने लाता है। उसका गठन उत्तराखंड की राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण बिंदु रहा है, जो उत्तराखंड के स्वाभिमान और उद्देश्य की पुनर्प्राप्ति का प्रतीक है।
जैसे-जैसे उत्तराखंड विकसित होता है, उत्तराखंड क्रांति दल द्वारा रखी गई मौलिक नीतियों की प्रेरणा जारी रहती है, जो हमें इस क्षेत्र के भविष्य को आकार देने में लगी जनसमुदाय संघर्षों की दृढ़ता की याद दिलाती है।
उत्तराखण्ड के इतिहास में स्थान
उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) की स्थापना 25 जुलाई 1979 को हुई थी, जब यह संगठन मसूरी के अनुपम होटल में एक सम्मेलन के दौरान गढ़वाल-कुमाऊं के तत्कालीन जननेताओं द्वारा गठित किया गया था। उस समय उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की विकास को लेकर सरकारी उपेक्षा का सामना कर रहा था और इसी संदर्भ में उक्रांद ने अपने गठन की प्रक्रिया को शुरू किया।
इस संगठन के गठन के बाद, उत्तराखंड क्रांति दल ने अपने मांगों की रक्षा करने के लिए विभिन्न राजनीतिक प्रक्रियाओं में भाग लिया, जिसमें उन्होंने सरकारी नीतियों और अधिकारों की मांग की। उक्रांद के सदस्य और नेताओं ने अपनी विचारधारा को समर्थन दिया, जो उत्तराखंड के स्थानीय विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाई।
उक्रांद का राजनीतिक संघर्ष अपनी बाहरी संगठना के साथ-साथ वन अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों पर भी रहा है। केन्द्रीय सरकार द्वारा वन अधिनियम में संशोधन के बाद, उत्तराखंड के वन्यजीवन और पर्यावरणीय संसाधनों को सुरक्षित रखने के प्रयास में उक्रांद ने अग्रसर होकर समुदाय के साथ मिलकर काम किया। उनके द्वारा कई प्रदर्शन और आंदोलन की अगुवाई की गई, जिनमें सड़क निर्माण, अन्य प्रोजेक्ट्स के खिलाफ पेड़ों की रक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा है।
लक्ष्य और विचारधारा
उत्तराखण्ड क्रांति दल (यूकेडी) एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल है जो उत्तराखण्ड राज्य के विकास, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित है। इसके मुख्य लक्ष्य और विचारधारा निम्नलिखित हैं:
उत्तराखण्ड क्रांति दल की विचारधारा और लक्ष्य राज्य के समग्र विकास, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय, और सांस्कृतिक संरक्षण पर आधारित हैं। वे उत्तराखण्ड की जनता के जीवन स्तर को सुधारने और राज्य की विशिष्ट पहचान को बनाए रखने के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।
राज्यत्व आंदोलन में भूमिका
केन्द्र द्वारा वन अधिनियम को सख्ती से लागू करते हुए हमारे जल, जंगल व जमीन के अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया। केन्द्र ने सभी राज्यों को अपने-अपने क्षेत्रफल का 20 प्रतिशत भाग वनआरक्षित क्षेत्र घोषित करने के आदेश दिये इस आदेश के पश्चात तब की मौजूदा उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के पर्वतीय क्षेत्र के सभी वनपंचायतों को वनआरक्षित क्षेत्र घोषित कर अपना 20 प्रतिशत पूरा कर लिया।
जिससे पर्वतीय क्षेत्र की अधिकांश परियोजनाएं व सड़क निर्माण के कार्य बाधित होने लगे। इसे उक्रांद ने काला कानून मानते हुए वन अधिनियम के विरुद्ध व अपने जल- जंगल- जमीन के हकों की लड़ाई प्रारंभ कर दी। जिसके तहत सम्पूर्ण प्रदेश में अधूरी रुकी परियोजनाओं और मार्ग निर्माण में बाधक पेड़ों को काटने का निर्णय लिया गया। इसके बाद तब के समय के तत्कालीन नेताओं ने अपने अपने क्षेत्रों में जनता के सहयोग से ऐसे पेडों का कटान शुरू कर दिया जो परियोजनाओं के आड़े आ रहे थे। हालांकि नेताओं द्वारा जितने पेड़ों को कटवाया गया उससे अधिक नये पेड़ भी उक्रांद नेताओं द्वारा लगाए गये, परंतु इसके बावजूद भी सरकार द्वारा उक्रांद के कई नेताओं के विरुद्ध दर्जनों मुकदमे दर्ज किए गये।
इसी कड़ी में दिनांक10 नवंबर 1986 को गढ़वाल कमिश्नरी पौड़ी तथा 9 मार्च 1987 को कुमाऊं कमिश्नरी नैनीताल में लाखों की संख्या में उत्तराखंड की जनता रैलियों में सम्मिलित हुई थी। दिनांक 23 अप्रैल1987 को दिल्ली में आहुत रैली के दौरान श्री त्रिवेंद्र सिंह पंवार के नेतृत्व में संसद भवन में “आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो” के नारे के साथ पत्रबम भी फेंका गया था। इस कार्य के चलते उन्हें पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया गया।
